कल्पना कीजिए एक ऐतिहासिक शहर को पूरी तरह सौर ऊर्जा से चलाया जाए। यही वादा किया गया था जब शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री of Madhya Pradesh Government, ने Sanchi Solar City InaugurationSanchi में देश की पहली 'सोलर सिटी' का उद्घाटन किया। लेकिन आज, दो साल बाद, स्थिति कुछ और ही है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह सपना 'फ्यूज' हो चुका है।
6 सितंबर 2023 को शाम 4 बजे, भोपाल से महज 46 किलोमीटर दूर स्थित इस बौद्ध तीर्थ स्थल को नए स्वरूप में देखा गया। सरकार का दावा था कि यह परियोजना न केवल ऊर्जा संकट को दूर करेगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी भारी कमी लाएगी। हालांकि, जमीनी हकीकत अब उस चमकदार आश्वासन से बहुत दूर खड़ी प्रतीत होती है।
बड़े दावे और तकनीकी विस्तार
परियोजना के तहत Goldi Solar और NHDC ने मिलकर 8 मेगावाट क्षमता का सौर पार्क विकसित किया। यह सुविधा Salamatpur स्थित ग्रिड में बिजली इंजेक्ट करती है। तकनीकी रूप से, यह प्रणाली काम कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रतिदिन लगभग 15,000 यूनिट बिजली उत्पादित कर रहा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस परियोजना से वार्षिक ₹7.68 करोड़ की बचत होने का अनुमान था। साथ ही, हर साल लगभग 13,747 टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आएगी, जो कि लगभग 2.3 लाख पेड़ों द्वारा अवशोषित कार्बन के बराबर है। इटली स्थित कंपनी FIMER ने अपने इनवर्टर उपकरणों का उपयोग इस परियोजना में किया था, जिससे इसे अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर पूरा होने का दावा था।
जमीनी हकीकत: टूटी स्ट्रीट लाइटें और बढ़े बिल
लेकिन जब बात आम नागरिकों तक पहुंचती है, तो तस्वीर बदल जाती है। NDTV की हिंदी रिपोर्ट और अन्य स्वतंत्र जांच पत्रकारिताओं ने खुलासा किया है कि उद्घाटन के महज एक साल के भीतर ही कई समस्याएं सामने आईं। सबसे बड़ी शिकायत है टूटी हुई सौर स्ट्रीट लाइटों की। कई गलियों में रोशनी का नामोनिशान मिट चुका है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि "सोलर सिटी" बनने के बावजूद उनके बिजली के बिल पहले जैसे ही हैं, या फिर बढ़ गए हैं। बार-बार होने वाली लोड शेडिंग और बिजली कटौती ने निवासियों को परेशान कर रखा है। एक स्थानीय निवासी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "यहाँ बनाई गई सोलर सिटी से आम जनता को कोई लाभ नहीं हुआ है।" यह कथन दर्शाता है कि नीति और क्रियान्वयन के बीच एक बड़ा खाई है।
उत्पादन बनाम वितरण: समस्या कहाँ है?
रहस्य यह है कि यदि 8 मेगावाट की बिजली उत्पादित हो रही है, तो फिर लोग क्यों परेशान हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन और वितरण प्रणाली (distribution network) में असंगति मुख्य कारण है। सौर पार्क से उत्पन्न बिजली को स्थानीय ग्रिड में डाला गया है, लेकिन घरेलू उपभोक्ताओं तक पहुँचने वाली अंतिम माइल कनेक्टिविटी कमजोर है।
इसके अलावा, छतों पर लगाए गए 63 किलोवाट क्षमता वाले सौर पैनलों का रखरखाव भी ठीक से नहीं हो पा रहा है। जब तक उपभोक्ता सीधे सौर ऊर्जा का लाभ नहीं उठा पाते, तब तक यह परियोजना केवल एक 'प्रोजेक्ट' ही रह जाएगी, न कि एक 'सिटी'।
भविष्य क्या है?
अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा? मध्य प्रदेश सरकार को इस परियोजना की समीक्षा करने की जरूरत है। क्या टूटी हुई स्ट्रीट लाइटों की मरम्मत होगी? क्या वितरण प्रणाली को सुधारा जाएगा? यदि नहीं, तो सांची का यह मॉडल अन्य शहरों के लिए चेतावनी बन सकता है, न कि प्रेरणा।
Frequently Asked Questions
सांची को सोलर सिटी क्यों घोषित किया गया?
सांची को भारत की पहली सोलर सिटी इसलिए घोषित किया गया क्योंकि इसकी कुल ऊर्जा आवश्यकता को सौर ऊर्जा से पूरा करने का लक्ष्य था। इसका उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाना और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना था।
क्या सांची का सौर पार्क अभी भी काम कर रहा है?
हां, तकनीकी रूप से 8 मेगावाट का सौर पार्क काम कर रहा है और यह सलामतपुर ग्रिड में बिजली भेज रहा है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर वितरण और रखरखाव की समस्याओं के कारण आम लोगों को लाभ नहीं मिल पा रहा है।
स्थानीय निवासियों की मुख्य शिकायतें क्या हैं?
निवासियों की मुख्य शिकायतें हैं: टूटी हुई सौर स्ट्रीट लाइटें, बिजली के बिलों में कमी न आना, और बार-बार होने वाली बिजली कटौती। वे मानते हैं कि परियोजना से उन्हें कोई व्यावहारिक लाभ नहीं हुआ है।
इस परियोजना से कितनी कार्बन कमी होने का अनुमान था?
सरकारी अनुमान के अनुसार, इस परियोजना से प्रति वर्ष लगभग 13,747 से 14,325 टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आने की उम्मीद थी, जो कि पर्यावरण के लिए एक बड़ा योगदान माना जाता था।
गोल्डी सौर और NHDC की भूमिका क्या थी?
गोल्डी सौर ने एनएचडीसी के साथ मिलकर सांची में 8 मेगावाट क्षमता का सौर पार्क विकसित किया। गोल्डी सौर ने इंजीनियरिंग और निर्माण कार्य संभाला, जबकि एनएचडीसी निवेश और विकास में शामिल थी।